डॉ आंबेडकर समानता के शिल्पकार थे-अधिवक्ता हृदयानंद मिश्र

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विश्वनाथ आनंद.
गया जी (बिहार/झारखंड)-हर साल 14 अप्रैल का दिन भारत के इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। यह दिन है संविधान निर्माता, समाज सुधारक और भारत रत्न डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर की जयंती का। 14 अप्रैल 1891 को महू, मध्य प्रदेश में जन्मे बाबासाहेब ने अपना पूरा जीवन सामाजिक भेदभाव, छुआछूत और असमानता के खिलाफ संघर्ष में लगा दिया।

अंबेडकर जयंती का महत्व
अंबेडकर जयंती सिर्फ एक महापुरुष का जन्मदिन नहीं है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि:
1. शिक्षा सबसे बड़ा हथियार है — बाबासाहेब का मंत्र था “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।”
2. समानता संविधान की आत्मा है — उन्होंने एक ऐसा भारत देखा जहाँ किसी के साथ जन्म के आधार पर भेदभाव न हो।
3. महिला सशक्तिकरण — हिंदू कोड बिल के जरिए उन्होंने महिलाओं को संपत्ति, तलाक और गोद लेने का कानूनी अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ी।
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“वो लड़का जो पानी नहीं पी सका”: बाबासाहेब की कहानी*

अंबेडकर जयंती विशेष – 14 अप्रैल

साल 1901। सतारा का एक सरकारी स्कूल। 10 साल का भीमा क्लास के बाहर फर्श पर बैठा है। प्यास लगी है, लेकिन घड़ा छू नहीं सकता। चपरासी तभी पानी पिलाएगा जब उसकी मर्ज़ी हो। उस दिन भीमा ने ठान लिया — “एक दिन ऐसा सिस्टम बनाऊंगा जहाँ पानी पीने के लिए किसी की मर्ज़ी नहीं चाहिए होगी।”

यही भीमा आगे चलकर डॉ. भीमराव आंबेडकर बना। अंबेडकर जयंती उस लड़के का जन्मदिन है जिसने अपमान को ताकत में बदल दिया।
बाबासाहेब का जीवन: संघर्ष से शिखर तक*
– शिक्षा की शक्ति: महार जाति में जन्मे आंबेडकर को बचपन में भयंकर जातिगत भेदभाव झेलना पड़ा। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। वे कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डॉक्टरेट करने वाले पहले भारतीय बने। अर्थशास्त्र और कानून में उनकी गहरी पकड़ ने ही उन्हें आगे चलकर संविधान सभा की मसौदा समिति का अध्यक्ष बनाया।
– सामाजिक क्रांति: 1927 का महाड़ सत्याग्रह, जिसमें दलितों को सार्वजनिक तालाब से पानी पीने का अधिकार दिलाया गया, और 1930 का नासिक का कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन उनके सामाजिक संघर्ष के बड़े उदाहरण हैं। उन्होंने कहा था, “मैं ऐसे धर्म को मानता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाता है।”
– संविधान के निर्माता: स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में उन्होंने 2 साल 11 महीने 18 दिन में दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान तैयार किया। अनुच्छेद 17 से छुआछूत का अंत, अनुच्छेद 15 से भेदभाव पर रोक और आरक्षण का प्रावधान — ये सब उनके दूरदर्शी सोच का परिणाम है।

आज के भारत में बाबासाहेब की प्रासंगिकता*
आज जब हम डिजिटल इंडिया और नए भारत की बात करते हैं, तो आंबेडकर के विचार और भी जरूरी हो जाते हैं। उन्होंने माना था कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अधूरा है जब तक सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र न हो। उनकी किताबें Annihilation of Caste और Who Were the Shudras? आज भी सामाजिक न्याय पर बहस का आधार हैं।

इस अंबेडकर जयंती पर हम क्या कर सकते हैं?
1. उनके जीवन और विचारों को पढ़ें और दूसरों को बताएं।
2. अपने आसपास किसी भी तरह के भेदभाव का विरोध करें।
3. शिक्षा को बढ़ावा दें, खासकर वंचित वर्गों में।

डॉ. आंबेडकर ने कहा था, “मैं उस समाज में विश्वास करता हूँ जिसमें सभी को समान अवसर मिलें।” अंबेडकर जयंती मनाने का सबसे अच्छा तरीका है उनके इस सपने को पूरा करने की दिशा में एक कदम बढ़ाना।

 

3 बातें जो बाबासाहेब को दूसरों से अलग बनाती हैं

1. किताबों से दोस्ती
बड़ौदा के महाराजा ने पढ़ने अमेरिका भेजा तो लोग हँसे — “महार पढ़कर क्या करेगा?” भीमा ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में 18-18 घंटे बैठकर जवाब दिया। MA, PhD, DSc, Bar-at-Law — इतनी डिग्रियाँ लीं कि लोग गिनना भूल जाएँ। उनका कहना था: “कलम तलवार से ज्यादा ताकतवर है।”

2. कुर्सी नहीं, बदलाव चाहिए
1947 में नेहरू ने उन्हें कानून मंत्री बनाया। पर बाबासाहेब कुर्सी से चिपके नहीं। जब हिंदू कोड बिल पास नहीं हुआ — वो बिल जो महिलाओं को तलाक और संपत्ति का हक देता — तो उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। बोले, “मंत्री रहना बड़ा नहीं है, सिद्धांत बड़ा है।”

3. संविधान: सिर्फ किताब नहीं, गारंटी कार्ड
25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में उन्होंने चेताया था: “हम राजनीतिक समानता तो ले आए, पर सामाजिक-आर्थिक समानता नहीं आई तो ये लोकतंत्र ढह जाएगा।” इसलिए अनुच्छेद 14 से 17 तक समानता का पूरा खज़ाना रखा। आरक्षण को उन्होंने “बैसाखी” कहा — “जब तक समाज के पैर बराबर न हो जाएँ।”
आज 2026 में बाबासाहेब क्यों ज़रूरी हैं?
– जब कोई बच्चा जाति की वजह से स्कूल में पीछे बैठता है — बाबासाहेब याद आते हैं।
– जब कोई लड़की कहती है “पापा की प्रॉपर्टी में मेरा भी हक है” — वो आवाज़ बाबासाहेब की देन है।
– जब UPSC का रिजल्ट आता है और पहली पीढ़ी का कोई दलित अफ़सर बनता है — वो सपना बाबासाहेब का था।

बाबासाहेब ने मूर्तियों में रहने से मना किया था। वो हमारे कानून में, हक में, और हिम्मत में ज़िंदा हैं।
हृदयानंद मिश्र, एडवोकेट एवं सदस्य हिन्दू धार्मिक न्यास बोर्ड झारखंड सरकार ।