नालंदा विश्वविद्यालय एशिया और विश्व में एक अग्रणी शिक्षण संस्थान के रूप में उभरेगा- राष्ट्रपति
DHIRAJ.
नालंदा विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित ज्ञान एवं शिक्षा केंद्र के रूप में पुनः उभरने का शुभ संकेत – राष्ट्रपति
आज का नालंदा विश्वविद्यालय भी अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को आकर्षित कर रहा हैं – राष्ट्रपति
गया जी। भारत के राष्ट्रपति ने नालंदा विश्वविद्यालय के दूसरे ऐसा दिक्षांत समारोह जिसमें राष्ट्रपति की गरिमामई उपस्थिति है।इस मौके पर संबोधित करते हुए कहा कि आप सभीमहावीर जयंती के शुभ अवसर पर मैं सभी लोगों को हार्दिक बधाई देती हूँ। लगभग एक ही कालखंड में अवतरित होने वाले भगवान महावीर और भगवान बुद्ध ने बिहार के इसी क्षेत्र से पूरी मानवता को अहिंसा, करुणा और प्रेम का संदेश दिया था।पाँचवीं शताब्दी में स्थापित प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय लगभग आठ शताब्दियों तक ज्ञान के एक महान केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित रहा है। नालंदा का पतन केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक बहुत बड़ी क्षति थी। फिर भी, नालंदा की अवधारणा जीवंत रही है। हमारे समय में इसका पुनरुत्थान उस गौरवशाली विरासत को आधुनिक परिवेश में पुनः स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
यह पुनरुत्थान दूरदर्शी नेतृत्व, सतत संस्थागत प्रयासों और सहयोगी देशों के समन्वय से संभव हो पाया है। यह इस बात का उदाहरण है कि साझा मूल्यों के आलोक में विभिन्न ,राष्ट्र उच्च लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। यह देखकर प्रसन्नता होती है कि आज का नालंदा विश्वविद्यालय भी अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को आकर्षित कर रहा है। यह नालंदा विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित ज्ञान एवं शिक्षा केंद्र के रूप में पुनः उभरने का शुभ संकेत है। नालंदा का मार्गदर्शक सिद्धांत ऋग्वेद के इस शाश्वत मंत्र में निहित है:
“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः”
अर्थात्—सभी दिशाओं से हमारे पास शुभ एवं श्रेष्ठ विचार आएँ।
सभी स्रोतों से अच्छे विचार ग्रहण करना केवल एक आदर्श नहीं था, बल्कि एक जीवंत परंपरा थी। नालंदा ने विविध विचारधाराओं का स्वागत किया और वाद-विवाद-संवाद को प्रोत्साहित किया। यहाँ ज्ञान को कभी भी अलग करके नहीं देखा गया; इसे नैतिकता, समाज और मानवता के व्यापक कल्याण से जोड़ा गया है। यह आदर्श आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। आज जब विश्व अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब करुणा पर आधारित स्वतंत्र और विवेचनापूर्ण चिंतन की आवश्यकता पहले से अधिक है।
मुझे विश्वास है कि नालंदा विश्वविद्यालय एशिया और विश्व में एक अग्रणी शिक्षण संस्थान के रूप में उभरेगा। यह न केवल अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता बल्कि अपने मूल्यों के लिए भी विशिष्ट पहचान बनाएगा। मुझे यह देखकर प्रसन्नता होती है कि विश्वविद्यालय interdisciplinary learning, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और स्थानीय समुदायों के साथ सहभागिता के माध्यम से इस दिशा में निरंतर अग्रसर है।
किसी भी विश्वविद्यालय के लिए अपने स्थानीय परिवेश से जुड़े रहना भी आवश्यक होता है। उसकी प्रगति का लाभ उस स्थानीय समाज को भी मिलना चाहिए, जहां वह स्थापित है। मैं विश्वविद्यालय की ‘सहभागिता संवाद’ पहल की सराहना करती हूँ, जिसके माध्यम से स्थानीय समुदायों और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के साथ जुड़ने के सार्थक प्रयास किए जा रहे हैं।
