विश्व वानिकी दिवस 2026 पर जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन

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DHIRAJ.

गया जी।विश्व वानिकी दिवस के अवसर पर पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, बिहार के तत्वावधान में विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। इस अवसर पर गया वन प्रमंडल के वन प्रमंडल पदाधिकारी, वन क्षेत्र पदाधिकारी , वनपाल, वनरक्षी एवं स्थानीय लोगों की उपस्थिति में कुसाबीजा पौधशाला बाराचट्टी, ब्रह्म वन पार्क, कोसडिहरा, गया तथा गुरपा वन प्रक्षेत्र अंतर्गत नवागढ़ पौधशाला एवं वन प्रक्षेत्र कार्यालय में पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया है। स्थानीय लोग एवं वनकर्मीयों ने मिलकर 200 से अधिक पौधे लगाए एवं इनके संरक्षण की भी जिम्मेदारी ली है।इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य लोगों को वन के महत्व, निरंतर घटते वनावरण, और इसके संरक्षण के प्रति जागरूक करना था। वन प्रमंडल पदाधिकारी ने कार्यक्रम के दौरान वन संरक्षण से संबंधित ऐतिहासिक और वैज्ञानिक तथ्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में पर्यावरणीय असंतुलन अपने चरम पर है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति ने मानव जीवन को संकटग्रस्त कर दिया है। इन परिस्थितियों में वन एक ऐसे प्राकृतिक तंत्र के रूप में सामने आते हैं, जो पृथ्वी के संतुलन को बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वैश्विक तापवृद्धि को नियंत्रित करते हैं, जल चक्र को संतुलित रखते हैं और मृदा अपरदन को रोकते हैं। इसके बावजूद, विडंबना यह है कि मानव अपनी तात्कालिक आवश्यकताओं और आर्थिक विकास की अंधी दौड़ में वनों का अंधाधुंध दोहन कर रहा है। यही कारण है कि आज वानिकी दिवस जैसे आयोजनों की आवश्यकता केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक जागरण के रूप में महसूस की जा रही है।

वनों की उपयोगिता का दायरा केवल पर्यावरणीय संतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक जीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
2026 में प्रस्तावित “वनों और अर्थव्यवस्था” थीम इस तथ्य को रेखांकित करती है कि वन सतत आर्थिक विकास के आधार हैं। लाखों लोगों की आजीविका सीधे तौर पर वनों पर निर्भर है। लघु वनोपज, औषधीय पौधे, रेजिन, गोंद, शहद और बांस जैसे उत्पाद न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इसके साथ ही, इको-टूरिज्म के माध्यम से भी रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। इस प्रकार वन एक ऐसे आर्थिक संसाधन के रूप में सामने आते हैं, जो विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं।
अंततः वन महोत्सव और अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस हमें यह संदेश देते हैं कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना ही मानव सभ्यता की स्थिरता का आधार है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम वनों को केवल संसाधन के रूप में न देखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन का अभिन्न अंग मानें। जब तक यह दृष्टिकोण विकसित नहीं होगा, तब तक पर्यावरणीय संकटों का समाधान संभव नहीं है। यदि हम सचमुच अपने भविष्य को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमें वनों की रक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाना होगा। यही वन महोत्सव की वास्तविक सार्थकता है और यही अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस का मूल संदेश भी।