संस्कृतियों का एकीकरण: एकता की प्ररेणा पुंज
DHIRAJ.
गया जी।वसुधैव कुटुंबकम् भारतीय संस्कृति की पावन और अविरल धारा में विभिन्न संस्कृतियों के प्रति आस्था और सम्मान का भाव “वसुधैव कुटुंबकम्” में निहित है।
“यह मेरा है, वह तुम्हारा है, यह सोच छोटे मन वालों की होती है; उदार चरित्र वालों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही एक परिवार है।”
भारत की एकता और विविधता
भारतवर्ष के लोगों ने इस विचार को हृदय में आत्मसात किया है। यही कारण है कि भारत की एकता, अखंडता और अस्मिता आज भी सम्पूर्ण विश्व के लिए उदाहरण हैं।
भारत विविध सांस्कृतिक धाराओं – भाषा, रीति-रिवाज, विश्वास – का देश है। यहाँ के लोग आपसी समझ, सम्मान और सामंजस्य स्थापित कर समाज में एकता की भावना को मजबूत करते हैं।
विविधता में एकता का यही सार है। जहाँ अलग-अलग पहचान होते हुए भी साझा मूल्यों और लक्ष्यों के लिए लोग एकजुट होते हैं। यह न केवल राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करता है, बल्कि सामाजिक स्थिरता को भी बढ़ाता है।
भारतीय संस्कृति की अमरता
जैसा कि प्रसिद्ध शायर अल्लामा इकबाल ने लिखा है –यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से।
अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा।
कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा।
इन पंक्तियों में भारतीय संस्कृति और इतिहास की दृढ़ता, लचीलेपन और अमरता झलकती है। कठिन परिस्थितियों में भी भारत की एकजुटता बनी रही, और इसका मूल कारण था विभिन्न संस्कृतियों के प्रति अटूट आस्था और सम्मान।
एकता का प्रकाश पुंज
संस्कृतियों का एकीकरण और संवर्धन ही भारत की एकता, अखंडता और अस्मिता का प्रकाश पुंज है। इसे भारत के लोग मन, वचन और कर्म में अपनाते आए हैं।
जैसा कि सर्वे भवन्तु सुखिनः श्लोक में कहा गया है –
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत् ॥
इसका अर्थ है – सभी सुखी रहें, सभी स्वस्थ रहें, सभी का भला हो और किसी को भी दुःख न हो।
इस विचार को अपनाकर हम सभी एकजुट हैं और सदैव एकजुट रहेंगे।
