“महर्षि दयानंद सरस्वती के जीवन दर्शन एवं उनकी शिक्षाएं” विषयक एक गरिमामय संगोष्ठी का आयोजन किया गया

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डा0 पंकज कौशिक ।

हरिद्वार। गुरुकुल कांगड़ी समविश्वविद्यालय के योग विभाग के सभागार में दयानंद जयंती की पूर्व संध्या पर “महर्षि दयानंद सरस्वती के जीवन दर्शन एवं उनकी शिक्षाएं” विषयक एक गरिमामय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के प्राध्यापकगण, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
संगोष्ठी की मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. प्रतिभा मेहता लूथरा ने महर्षि दयानंद सरस्वती के जीवन और उनके क्रांतिकारी विचारों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि महर्षि दयानंद का “वेदों की ओर लौटो” का आह्वान केवल धार्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि सामाजिक और बौद्धिक जागरण का संदेश था। उन्होंने कहा कि वेद मानव जीवन के लिए प्रमाणित ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का आधार हैं, जिनमें सार्वभौमिक सत्य निहित है। महर्षि दयानंद ने अंधविश्वास, कुरीतियों और सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष कर समाज को नई दिशा प्रदान की।

प्रमुख वक्ता अनुज शास्त्री ने अपने संबोधन में कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में आर्य समाज का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। आर्य समाज ने राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया और अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरणा प्रदान की। महर्षि दयानंद के विचारों ने देश में स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और सामाजिक सुधार की भावना को सुदृढ़ किया।योग एवं शारीरिक शिक्षा संकायाध्यक्ष प्रो. सत्यदेव निगमांलकार ने कहा कि गुरुकुल कांगड़ी संस्थान का स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष योगदान रहा है। इस संस्थान ने शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रभक्ति, चरित्र निर्माण और वैदिक मूल्यों के संवर्धन का कार्य निरंतर किया है।
परीक्षा नियंत्रक प्रो. एल. पी. पुरोहित ने बताया कि गुरुकुल कांगड़ी सम विश्वविद्यालय में विज्ञान विषयों के साथ-साथ वैदिक विषयों का भी अध्ययन कराया जाता है, जिससे विद्यार्थियों को आधुनिक ज्ञान और प्राचीन भारतीय परंपरा का समन्वित बोध प्राप्त होता है।
डॉ. दीनदयाल वेदालंकार ने कहा कि महर्षि दयानंद को समझने के लिए वेदों का गहन अध्ययन आवश्यक है, क्योंकि उनके समस्त विचारों और आंदोलनों की मूल प्रेरणा वेदों से ही प्राप्त हुई थी।संगोष्ठी के अंत में उपस्थितजनों ने महर्षि दयानंद सरस्वती के आदर्शों को आत्मसात करने तथा उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लिया। संगोष्ठी का संचालन डॉ ऊधम सिंह ने किया।

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