बहन मायावती को देश का प्रधानमंत्री बनाकर दलितों को उचित सम्मान दिलायें नरेन्द्र मोदी :- अपराजिता मिॆश्रा

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विश्वनाथ आनंद .
पटना( बिहार)- हमारे देश में दलितों को लेकर राजनीति बहुत होती है, लेकिन आम दलितों को उचित सम्मान व वास्तविक न्याय बहुत कम मिलती है। वर्तमान सरकार और भाजपा ऐसा प्रदर्शन करती है मानो दलित समाज को उसने ‘पेटेंट’ करवा रखा हो।यदि भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी जी को सचमुच दलित समाज से ज़रा भी सच्चा लगाव है, तो इसका सबसे ठोस प्रमाण यह होगा कि वे प्रधानमंत्री पद किसी दलित को सौंपने की घोषणा करें।जैसे नितिश कुमार ने बिहार में कर के बङे दिल का परिचय दिया था।उक्त बातें सुप्रसिद्ध समाजसेविका , राष्ट्रीय ब्रह्मान महासभा की सदस्या एवं लेखिका श्रीमती अपराजिता मिश्र ने कही .उन्होंने कहा कि बहन मायावती जी न केवल दलित समाज की सशक्त आवाज़ हैं, बल्कि वे एक अनुभवी प्रशासक, पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय राजनीति की परिपक्व नेता भी हैं.मायावती ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में अपने शासनकाल (विशेषकर 2007-2012) में SC/ST एक्ट के कथित दुरुपयोग को रोकने के लिए निर्देश जारी किए थे।

उन्होंने यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया था कि केवल शिकायत के आधार पर निर्दोष लोगों को न फंसाया जाए और गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच की जाए , केवल शिकायत भर के आधार पर निर्दोष लोगों को परेशान न किया जाए । न्याय का स्थापित सिद्धांत यही है न कि वो जो मोदी जी ने SC/ST बिल लाकर किया । मोदी जी का कतई उद्देश्य ये नहीं था कि दलितों को न्याय मिले,बल्कि उनका लक्ष्य समाज में घृणा -नफरत फैलाकर जात-पात में लोगों को बांटे रखना “फूट डालकर शासन” की नीति मोदी जी ने ब्रिटिश सत्ता की यादें ताजा कर दी। श्रीमती मिश्रा ने कहा कि बहन मायावती जी ने अपने शासनकाल में जातिगत हिंसा को बढ़ावा न देकर और आफिसरशाही पर कड़े प्रशासनिक नियंत्रण के माध्यम से शासन चलाया। यूपी में स्वर्णो दलितों और मुसलमानों को साथ लेकर बिना भेदभाव के शासन चलाने का प्रयोग बहन जी कर चुकी है। केवल प्रतीकों, नारों ,आयोजनों और खुनी हिंसा से नहीं—सत्ता में वास्तविक भागीदारी से ही सामाजिक न्याय सिद्ध होता है।
इतिहास बताता है कि जब सत्ता निरंकुश हो जाती है, जनता से संवाद खो देती है और असहमति को बोझ मानने लगती है, तो वह धनानंद जैसी आलोचनाओं का पात्र बनती है—नाम बदलते हैं, प्रवृत्तियाँ नहीं।धनानंद का पतन तलवार से नहीं, जनविरोध से हुआ था—यह इतिहास का संदेश हर शासक के लिए चेतावनी है।

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