जीविका समूह केवल समूह नहीं, 11 लाख ‘छोटी कंपनियां’ हैं जो बिहार की तकदीर बदल रही हैं-एमएलसी जीवन कुमार
-विपक्ष सरकारी फाइलों में नौकरी ढूंढ रहा, हमने हर घर की महिला को ‘मालकिन’ बना दिया.
विश्वनाथ आनंद .
पटना (बिहार)- बिहार विधान परिषद के सदस्य (शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र) जीवन कुमार ने बुधवार को सदन में वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट और ग्रामीण विकास विभाग के प्रस्तावों का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने 3,47,589 करोड़ रुपये के इस बजट को बिहार के इतिहास का सबसे बड़ा और विकासोन्मुखी बजट बताया।सदन में बोलते हुए एमएलसी जीवन कुमार ने विपक्ष के रोजगार संबंधी सवालों का करारा जवाब दिया। उन्होंने कहा, “विपक्ष के साथी पूछते हैं कि रोजगार कहाँ है? उन्हें शायद दिखाई नहीं देता। बिहार में चल रहे 11 लाख 45 हजार स्वयं सहायता समूह को केवल समूह मानने की भूल मत कीजिये। ये ‘छोटी-छोटी कंपनियाँ’ हैं,महिलाओं की तकदीर बदल रही हैं।उन्होंने कहा कि इन समूहों ने 1 करोड़ 40 लाख परिवारों को आर्थिक सुरक्षा दी है और 31 लाख 71 हजार महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाया है। विपक्ष केवल सरकारी फाइलों में नौकरी ढूंढता रह गया, जबकि एनडीए सरकार ने बिहार की महिलाओं को ‘उद्यमी’ और ‘मालकिन’ बना दिया है।
उन्होंने अपने भाषण में भारतेन्दु हरिश्चंद्र की पंक्तियों— “लीक छांड़ि तीनों चलें, शायर, शेर, सपूत” का जिक्र करते हुए पूर्व की सरकारों पर तीखा हमला बोला।उन्होंने कहा कि 2005 से पहले की सरकारें ‘कपूत’ की तरह थीं जो पुरानी और गलत परंपराओं (जंगलराज) की लीक पर चल रही थीं। लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और एनडीए की सरकार ‘सपूत’ है, जो लकीर की फकीर नहीं है बल्कि विकास का नया रास्ता खुद बनाती है।” उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कथन को दोहराते हुए कहा कि यह सरकार मक्खन पर नहीं, पत्थर पर लकीर खींचने का काम कर रही है।शिक्षा के बाद सबसे ज्यादा बजट (23,701 करोड़ रुपये) गाँवों के विकास के लिए दिया गया है।2004-05 में जहाँ बजट का 14.5 प्रतिशत ब्याज भरने में जाता था, अब कुशल प्रबंधन के कारण यह मात्र 7.3 प्रतिशत ही रह गया है।जीविका दीदियाँ अब केवल अचार-पापड़ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे ‘दीदी की रसोई’, सोलर लैंप निर्माण और पुस्तकालय संचालन जैसे तकनीकी और सामाजिक कार्य कर रही हैं। उन्होंने अंत में कहा कि यह बजट विकसित बिहार की नींव है और वे इसका पूर्ण समर्थन करते हैं।