बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह (श्री बाबू) उनके व्यक्तित्व,कृतित्व और 1990 के दशक से पूर्व सामाजिक न्याय के केंद्र में बिहार के विकास में काॅग्रेस की भूमिका

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आदित्य पासवान .

बिहार के आधुनिक इतिहास में श्रीकृष्ण सिंह (श्री बाबू) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है । वे बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री ही नहीं,बल्कि राज्य की लोकतांत्रिक, सामाजिक और आर्थिक दिशा निर्धारित करने वाले दूरदर्शी नेता थे । उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने बिहार में सामाजिक न्याय, औद्योगिक विकास और समावेशी प्रगति की मजबूत नींव रखी, जिसका प्रभाव 1990 के दशक तक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है ।

श्रीकृष्ण सिंह का व्यक्तित्व और कृतित्व:

श्रीकृष्ण सिंह का व्यक्तित्व सादगी, नैतिकता, प्रशासनिक दृढ़ता और सामाजिक समरसता का प्रतीक था । वे जाति, वर्ग और धर्म से ऊपर उठकर एक ऐसे बिहार की कल्पना करते थे जहाँ समानता और न्याय हो उनका सबसे ऐतिहासिक कार्य जमींदारी प्रथा का उन्मूलन था, जिसने किसानों, दलितों और पिछड़े वर्गों को सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की । उन्होंने कानून का शासन स्थापित किया, प्रशासन को उत्तरदायी बनाया और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया । उनके शासनकाल में बिहार स्थिरता, अनुशासन और विकास का उदाहरण बना ।

1990 के दशक से पूर्व बिहार के विकास में कांग्रेस की उपलब्धियाँ:

श्रीकृष्ण सिंह और उनके बाद कांग्रेस नेतृत्व में 1990 के दशक से पहले बिहार ने विकास की एक स्पष्ट दिशा देखी । इस काल में औद्योगिकरण को विशेष प्रोत्साहन दिया गया । राज्य में चीनी मिलें, जूट मिलें, कागज कारखाने, सीमेंट फैक्ट्रियाँ और अन्य लघु-मध्यम उद्योग स्थापित हुए, जिनसे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन हुआ ।

साथ ही सिंचाई परियोजनाओं, सड़क निर्माण, शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों के विस्तार ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के विकास को गति दी । बिहार की अर्थव्यवस्था कृषि और उद्योग दोनों के संतुलन पर आधारित थी ।

दलित व वंचितों को मध्यम वर्ग में लाने में कांग्रेस की अहम् भूमिका:

कांग्रेस की सामाजिक न्याय नीति की सबसे बड़ी उपलब्धि थी की कांग्रेस ने दलितों और वंचित वर्गों को मध्यम वर्ग में स्थापित किया । शिक्षा के विस्तार, सरकारी नौकरियों में आरक्षण, भूमि सुधार और औद्योगिक रोजगार के माध्यम से दलित समाज को आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सम्मान मिला ।

जमींदारी उन्मूलन से भूमि अधिकार, उद्योगों में नियमित रोजगार और शिक्षा से प्राप्त अवसरों ने दलित वंचित समाज के एक बड़े वर्ग को आत्मनिर्भर बनाया । यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और आत्मसम्मान का भी था ।

सामाजिक न्याय के प्रति कांग्रेस का दृष्टिकोण:

कांग्रेस के लिए सामाजिक न्याय केवल नारा नहीं, बल्कि शासन की मूल भावना थी । संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने का प्रयास किया गया । कमजोर वर्गों के कल्याण को विकास से जोड़कर देखा गया, जिससे सामाजिक संतुलन बना रहा ।

1990 के दशक में राजनीति का अपराधीकरण और उसके दुष्परिणाम:

1990 के दशक में बिहार की राजनीति में अपराधीकरण और भय का वातावरण बढ़ा, जिससे कानून-व्यवस्था कमजोर हुई । इसका सीधा प्रभाव उद्योगों पर पड़ा । परिणामस्वरूप चीनी मिलें, जूट मिलें, कागज और सीमेंट फैक्ट्रियाँ जैसी सैकड़ों औद्योगिक इकाइयाँ बंद हो गईं। इससे बेरोजगारी बढ़ी और लाखों लोगों को रोजगार की तलाश में राज्य से बाहर पलायन करना पड़ा । बिहार की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना दोनों प्रभावित हुईं ।

कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में और 1990 के दशक से पूर्व कांग्रेस शासन के दौरान बिहार ने सामाजिक न्याय, औद्योगिक विकास और समावेशी प्रगति का संतुलित मॉडल प्रस्तुत किया । दलितों और वंचित वर्गों को मध्यम वर्ग में स्थान दिलाने, उद्योगों के माध्यम से रोजगार सृजन करने और कानून के शासन को स्थापित करने में कांग्रेस की भूमिका ऐतिहासिक रही है । आज बिहार के विकास की समीक्षा करते समय श्रीकृष्ण सिंह के विचारों और उस दौर की नीतियों से सीख लेना अत्यंत आवश्यक है ।

बिहार काॅग्रेस

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