श्रीराम नैतिक मूल्यों की जीवित स्मृति कथा हैं-डॉक्टर विवेकानंद मिश्र

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विश्वनाथ आनंद .
गया जी ( बिहार )-गया जी, स्थानीय डॉक्टर विवेकानंद पथ में रामनवमी के पावन अवसर पर भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के द्वारा एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का शुभारंभ महासभा एवं मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर विवेकानंद मिश्रा ने किया . उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि विश्व इतिहास में रामराज्य के पद प्रदर्शक श्रीराम नैतिक मूल्यों के जीवित स्मृति कथा हैं। राम ने सृष्टि के समक्ष अपने क्रियाकलाप से अद्वितीय लोकप्रियता हासिल की है।आज भी उनकी लोकप्रियता ही अक्षुण्ण ही नहीं, बल्कि शताब्दियों तक बढ़ती रही। मानव हृदय को आकर्षित करने की अद्वितीय शक्ति जो रामराज्य राम कथा में विद्यमान वह अत्यंत ही दुर्लभ है।इस ऐतिहासिक वैचारिक सभा आयोजन का मुख्य उद्देश्य केवल चैत्र शुक्ल नवमी की पंचांगीय तिथि का रूढ़िवादी उत्सव मनाना नहीं था, अपितु रामनवमी के इस परम पुनीत अवसर पर वैश्विक अशांति और रामराज्य की अनिवार्यता पर गहन मंथन करना था। सम्मानित साहित्यकार आचार्य राधा मोहन मिश्रा माधव ने कहा की अखिल ब्रह्मांड के अधिपति, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का धराधाम पर अवतरण केवल एक आख्यान नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, सत्य और न्याय की वह शाश्वत ज्योति है, जिसने युगों-युगों तक मानवता को आलोकमय किया है।किन्तु इस प्रबुद्ध गोष्ठी में प्रोफेसर सुनील कुमार मिश्रा ने वर्तमान समाज की विदारक सत्यता का निर्मम और तीखा विश्लेषण किया, तो यह नग्न यथार्थ उभरकर सामने आया कि आज का मानव राम के आदर्शों को विस्मृत कर स्वार्थ, लोलुपता और चारित्रिक पतन के गहरे गर्त में आकंठ निमग्न हो चुका है।डॉ ज्ञानेश भारद्वाज ने कहा इस चारित्रिक पतन और वैचारिक शून्यता की परिणति केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है, अपितु इसने संपूर्ण विश्व को एक भयावह और रक्तपाती संघर्ष के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, जिसका जीवंत और वीभत्स प्रमाण आज ईरान और इज़राइल के मध्य धधकती युद्ध की ज्वालाएं हैं।समाजसेवी किरण पाठक एवं रंजू देवी ने कहा यह वैश्विक तनाव केवल दो राष्ट्रों का भू-राजनैतिक संघर्ष नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के नैतिक स्खलन, वैमनस्य और पाशविक प्रवृत्तियों के उद्वेग का वह नग्न प्रदर्शन है, जो राम के आदर्शों के सर्वथा विपरीत है,

जहाँ शत्रु के प्रति भी शिष्टाचार और युद्ध में भी धर्म की मर्यादा का कठोरता से पालन किया जाता था।दिव्यांशु ने कहा इस भयावह कोलाहल और संहारक अस्त्रों की छाया में बैठी रक्तपिपासु होती दुनिया के मध्य रामराज्य जैसी सर्वसमावेशी, न्यायपूर्ण और धर्माधारित व्यवस्था की अनिवार्यता आज पहले से कहीं अधिक अपरिहार्य हो उठी है।और इसी ज्वलंत आवश्यकता को रेखांकित करते हुए विष्णुपद प्रबंध कलिनी समिति के सचिव गजाधर लाल पाठक ने अपने ओजस्वी एवं प्रहारक उद्बोधन में वर्तमान व्यवस्था के खोखलेपन पर निर्मम कुठाराघात किया; उन्होंने अत्यंत उद्वेलित स्वर में स्पष्ट किया कि आज का दिशाहीन समाज जिस अंधी दौड़ में हांफ रहा है, वह अंततः उसे विनाश के अंधकूप में धकेल देगी।आचार्य अभय पाठक एवं सुनील पाठक ने श्रीराम के शाश्वत आदर्शों से विमुख होकर, स्वार्थ व अहम् की वेदी पर मानवता की जो बलि दी जा रही है, वह संपूर्ण मानव जाति के पतन का स्पष्ट शंखनाद है।संगोष्ठी किअध्यक्षता करते हुए इसी वैचारिक प्रवाह को और अधिक प्रखरता प्रदान करते हुए आचार्य सच्चिदानंद मिश्रा जी ने समाज के उस पाखंड और खोखले आचरण की कठोरतम भर्त्सना की, जहाँ धर्म केवल बाह्य प्रदर्शन, आडंबर और राजनीतिक स्वार्थ-सिद्धि का साधन मात्र बनकर रह गया है; उन्होंने अत्यंत क्षोभ के साथ इस सत्य को उद्घाटित किया कि हमने राम के नाम को तो अपने होठों पर सजा लिया है, परंतु उनके आचरण, उनके त्याग और उनकी मर्यादा को अपने अंतःकरण से पूर्णतः निष्कासित कर दिया है, और उनका यह आह्वान हृदय को बेधने वाला था।संगोठी में डॉ रविंद्र कुमार ने कहा जब तक समाज इस आत्मप्रवंचना और धार्मिक पाखंड के आवरण को चीरकर वास्तविक धर्म और न्यायपूर्ण आचरण की ओर नहीं लौटता, तब तक कोई भी अनुष्ठान या जयघोष मानवता का कल्याण नहीं कर सकता।अंततः शिक्षाविद प्रख्यात साहित्यकार प्रोफेसर मनोज कुमार मिश्रा पद्मनाभ ने कहा यह निर्विवाद सत्य है कि यह समय केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना के जागरण और निर्मम आत्म-मूल्यांकन का है।