हनुमान त्याग सेवा निश्छल प्रेम के जीवंत देव हैं- डॉक्टर विवेकानंद मिश्रा
विश्वनाथ आनंद .
गया जी (बिहार)-पुण्यसलिला फल्गु नदी के पावन तट पर मोक्षदायिनी नगरी गया जी में श्री हनुमान जन्मोत्सव के अनुपम एवं मंगलमय अवसर पर एक अत्यंत गरिमामय तथा दिव्य सभा का आयोजन संपन्न हुआ। यह आध्यात्मिक समाग डॉक्टर विवेकानंद पथ पर भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा के, द्वारा योजित किया गया जहां उपस्थित विद्वज्जन पवनपुत्र हनुमान जी के प्राकट्य दिवस की इस बेला में संपूर्ण वातावरण वेद मंत्रों की पुण्य ध्वनि और जय श्री राम के गगनभेदी उद्घोष से गुंजायमान हो रहा था। इस अनुष्ठान में समाज के विभिन्न वर्गों के प्रबुद्धजन और साधक सुशोभित थे जिन्होंने अपने ज्ञान और गंभीर चिंतन से इस सभा को एक अलौकिक कांति प्रदान की। भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ विवेकानंद मिश्र जी ने सभी अतिथियों का पूर्ण आत्मीयता एवं पारंपरिक स्नेह के साथ स्वागत किया और अपने संबोधन में कहा कि मर्यादित आचरण के शिखर गदाधारी महावीर हनुमान जी की प्रासंगिकता युग युग से निरंतर सुरक्षित रही है उनका चरित्र एक ऐसी संजीवनी है जो हताश निराश निष्प्राण हो गए शरणागत भक्तों को भी सजीव बना सकता है। डॉ मिश्र जी ने अत्यंत मार्मिक ढंग से स्पष्ट किया कि मारुति नंदन हनुमान जी केवल असीम बल और पराक्रम के प्रतीक नहीं हैं अपितु वे ज्ञान गुन सागर हैं और उनका संपूर्ण जीवन शौर्य तथा विवेक के अद्वितीय संतुलन का सर्वोच्च उदाहरण है।महासभा के संरक्षक श्रीशिवचरण बाबू डालमिया ने इस बात पर बल दिया कि वर्तमान समय में समाज और विशेषकर विप्र समाज को श्री हनुमान जी की निस्वार्थ सेवा भावना और अटूट समर्पण को अपने आचरण में उतारना चाहिए। समाजसेवी मृदुला मिश्रा ने कहा कि एक ज्ञानवान व्यक्ति जब अहंकार से सर्वथा मुक्त होकर समाज की सेवा के लिए तत्पर होता है तभी राष्ट्र और धर्म का वास्तविक उत्थान संभव हो पाता है।
उनकी इस तथ्यपूर्ण और प्रेरक वाणी ने उपस्थित जनसमूह के हृदय में धर्म और कर्तव्य बोध की एक नई ज्वाला प्रज्वलित कर दी। इसी पुण्य कड़ी में आगे बढ़ते हुए, समारोह के अध्यक्षता करते हुए महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आचार्य सच्चिदानंद मिश्र जी ने ज्ञान और भक्ति के इस मनोहारी क्षण में अपने अनमोल विचारों का प्रवाह किया। आचार्य सच्चिदानंद मिश्र जी की ओजस्वी और शास्त्रसम्मत वाणी ने सभा में एक अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार कर दिया। उन्होंने रामायण के विभिन्न प्रसंगों का सजीव वर्णन करते हुए बताया कि श्री हनुमान जी की अजेय शक्ति उनकी अनन्य राम भक्ति में निहित है और उनका प्रत्येक कार्य केवल ईश्वरीय इच्छा की पूर्ति का एक पुनीत माध्यम था। आचार्य सच्चिदानंद मिश्र जी ने समझाया कि विद्या ददाति विनयं का मूल मंत्र हनुमान जी के चरित्र में पूर्णतया चरितार्थ होता है क्योंकि अथाह शक्ति और अतुलित ज्ञान के स्वामी होने के पश्चात भी उन्होंने स्वयं को सदैव एक विनम्र दास के रूप में ही प्रस्तुत किया है।धन्यवाद ज्ञापित करते हुए सुनील कुमार पाठक ने कहा कि हृदय में राम और हाथों में सत्कर्म को धारण करके ही मनुष्य अपने मानव जीवन को सार्थक बना सकता है। दोनों विद्वानों के इस विशद एवं ज्ञानवर्धक चिंतन ने वहां उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को अत्यंत गहरे तक प्रभावित किया। सभा का समापन श्री हनुमान चालीसा के सामूहिक पाठ और महाआरती के साथ हुआ जिसके पश्चात सभी ने प्रभु का महाप्रसाद ग्रहण किया। यह धार्मिक समागम केवल एक आयोजन बनकर नहीं रह गया अपितु ज्ञान भक्ति और सामाजिक समरसता का एक ऐसा उदाहरण बन गया जिसके सात्विक प्रभाव और दिव्य स्मृतियां लंबे समय तक गया जी के इस पावन आवास में अनुगूंजित रहेंगी.समझ में जिन प्रमुख व्यक्तियों ने अपने विचार प्रकट किया उपस्थित रहे उनमें डॉ ज्ञानेश्वर भारद्वाज, डॉक्टर रविंद्र कुमार, डॉक्टर जितेंद्र कुमार मिश्रा, महेश मिश्रा, विश्वजीत चक्रवर्ती, शंभू गिरी, दिलीप कुमार, नीरज वर्मा ,रूबी कुमारी, धर्मेंद्र कुमार ,शिवाजी सिंह, रणजीत मिश्रा ,रंजीत पाठक, पवन मिश्रा, अमरनाथ पांडे ,आचार्य राजाबाबू ,बबलू गोस्वामी, रंजना पांडे ,शीला त्रिपाठी, पुष्प लता ,शीतल चौबे, दीपक पाठक ,मनीष कुमार, रंजीत राज ,डिंपल कुमारी, अनुपम मिश्रा ,मेघा मिश्रा, अजय कुमार मिश्रा ,सुनील कुमार ,अभय कुमार , सूबेदार सिंह ,नौरंगी दास, गुप्तेश्वर ठाकुर ,फूल कुमारी, नीलम कुमारी ,पार्वती देवी, मालती देवी ,बेबी देवी किरण कंचन पाठक, वीकरम मिश्रा का नाम शामिल है.
