शब्दवीणा के राष्ट्रीय कवि सम्मेलन “आने वाली है अब होली” में गूंजे रंगों से भरे मधुर गीत

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विश्वनाथ आनंद .
-फूलों पर भँवरों ने निगाहें बिछाई, होली आई.
-हमने भरकर रुमाल होली में, तुमको भेजा गुलाल होली में.
-आमों की डाली पर झूला झूल-झूल कोयलिया बोली। कब तक घर में बंद रहोगे, आने वाली है अब होली?.
गया जी( बिहार )-राष्ट्रीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था शब्दवीणा की कर्नाटक प्रदेश समिति के तत्त्वावधान में “आने वाली है अब होली” राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। शब्दवीणा कर्नाटक प्रदेश अध्यक्ष सुनीता सैनी गुड्डी द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ रश्मि प्रियदर्शनी द्वारा प्रस्तुत शब्दवीणा गीत की सुमधुर प्रस्तुति से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। कवि सम्मेलन का संचालन प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती सैनी एवं प्रदेश उपाध्यक्ष विजयेन्द्र सैनी ने संयुक्त रूप से किया; तथा अध्यक्षता वरिष्ठ कवयित्री विनीता लावणिया ने की। श्रीमती लावणिया ने प्रस्तुत सभी रचनाओं पर सारगर्भित समीक्षात्मक टिप्पणियाँ देकर कवि-कवयित्रियों का उत्साहवर्द्धन किया। विशिष्ट अतिथि पुरुषोत्तम तिवारी ने होली को प्रेम, आनंद एवं सद्भावना का पर्व बताते हुए आमंत्रित सभी रचनाकारों के सुखद जीवन की कामना करते हुए शुभकामनाएं दीं।

कवि सम्मेलन में गया, बिहार से जैनेन्द्र कुमार मालवीय एवं डॉ रश्मि प्रियदर्शनी, देवघर, झारखंड से डॉ विजय शंकर एवं सोनम झा, पश्चिम बंगाल से हिमाद्रि मिश्रा एवं पुरुषोत्तम तिवारी, कर्नाटक से सुनीता सैनी गुड्डी, विजयेंद्र सैनी, निगम राज़, संध्या निगम, आनंद दाधीच दधीचि, पूनम शर्मा, कुमार प्रवाल सिंह राणा, के. के. राजपूत, अरुणा राणा, विनीता लावाणिया एवं फूलमाला वर्मा, हरियाणा से सरोज कुमार एवं अशोक जाखड़, मध्य प्रदेश से अरुण अपेक्षित, उत्तर प्रदेश से मधु श्रीवास्तव, उत्तराखंड से आशा साहनी ने “आने वाली है अब होली” एवं “होली के रंग, कविताओं के संग” विषयों पर एक से बढ़कर एक गीत, गज़ल, मुक्तक एवं दोहे पढ़े। डॉ रश्मि प्रियदर्शनी ने “आमों की डाली पर झूला झूल-झूल कोयलिया बोली। कब तक घर में बंद रहोगे, आने वाली है अब होली” गीत सुनाकर कवि सम्मेलन के मूल प्रतिपाद्य पर प्रकाश डाला।

अरुण अपेक्षित की रचना “हमने भरकर रुमाल होली में, तुमको भेजा गुलाल होली में”, मधु श्रीवास्तव के होली गीत “गोरी तेरे गालों पे, लाल, लाल लाली काहे, नंद जी के लाल संग खेली का होली है”, हिमाद्रि मिश्रा के फाग गीत “राधा प्यारी, प्यारी लगती न्यारी रे। जपे राधा-राधा कृष्ण-कन्हाई रे” व “फाग खेलत दशरथ लाल, फाग खेलत रे” एवं जैनेन्द्र कुमार मालवीय के गीत “सांस्कृतिक सद्भाव प्रेम का, पावन पर्व ही होली है” सुनकर श्रोतागण झूम उठे। संध्या निगम की “मेरी चुनरी में पड़ गयो दाग रे, श्याम कैसो चटक रंग डारो”, फूलमाला वर्मा की “मैं तो पी गई सजना भांग होली के हुड़दंग में”, के. के. राजपूत की “काश ऐसा हो जाए, जीवन रंगी हो जाए”, प्रवाल प्रताप सिंह की “आए कान्हा संग में ग्वाले, राधा जो मुस्काई, खेले होली कृष्ण प्रिया संग, आई होली आई”, विनीता लावणिया की “रंग मत डारे रे सांवरिया, रंग मत डारे रे” एवं अरुणा राणा की “ब्रज में मस्ती छाई रे, होली आई रे, आई रे, होली आई रे” पंक्तियों पर खूब वाहवाहियाँ लगीं।

आनंद दधीचि की “फूलों पर भँवरों ने निगाहें बिछाई, होली आई”, निगम राज़ की “रंग डारो अपने रंग, मदन यों खेलो होली”, आशा साहनी की “उत्सव सुहाना देखकर बादल सदा विह्वल हुआ”, सरोज कुमार की “होली के हुड़दंग में देखो, भींगी मेरी साड़ी”, पूनम शर्मा की “मुझे मिल गया नंद का लाल रसिया होली में। मेरी माला हो गई लाल रसिया होली में” ने कवि सम्मेलन को होली के रंगों में सराबोर कर डाला। डॉ विजय शंकर की प्रेरक रचना “होली है आज” तथा सोनम झा की “आजादी की वेदी पर जिसने यौवन वार दिया। उसके घर सन्नाटा नहीं, गौरव का उजियारा है। लहराता तिरंगा प्यारा है” को भी खूब सराहना मिली। सुनीता सैनी का वेलेंटाइन डे पर रचित गीत “बिना पूजा पाठ के, ये कैसे त्योहार हैं” एवं विजयेन्द्र सैनी का मुक्तक “तुम्हें रंगने की खातिर तो सातों रंग तरसते हैं” भी श्रोताओं को बड़ा रुचिकर लगा। फेसबुक पर शब्दवीणा केन्द्रीय पेज से प्रसारित कवि सम्मेलन का समापन पावन शांति पाठ से हुआ।