भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के तत्वाधान में संस्कृत दिवस समारोह संपन्न….

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विश्वनाथ आनंद

गया जी (बिहार )-गया जी के स्थानीय डॉक्टर विवेकानंद पथ में भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के तत्वावधान में आयोजित संस्कृत दिवस समारोह पूर्वक संपन्न हुआ।

समारोह का शुभारंभ करते हुए साहित्याचार्य एवं सम्मानित साहित्यकार आचार्य राधामोहन मिश्र “माधव” ने अपने उद्बोधन में भारतीय संस्कृति के ह्रास का कारण देवगिरा संस्कृत के प्रति उदासीन मानसिकता को इंगित करते हुए कहा कि हम ज्ञान -वैभव के भांडागार प्राचीन भाषा संस्कृत को

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में नवीकृत नहीं कर सके। इसका लाभ आंग्लभाषा को मिला। जबकि अत्याधुनिक संकलक/कम्प्यूटर युग में यह प्रमाणित हो गया है कि विश्व की सर्वथा वैज्ञानिक भाषा संस्कृत ही है। विदेशी विद्वानों ने हमारी उपेक्षा का लाभ उठाया। जर्मन विद्वान मैक्समूलर इसके उदाहरण हैं जिन्होंने वेदादि महान ग्रंथों के मूल भावों का अपने अनुरूप अनुवाक् किया। आज आवश्यकता पुनर्लेखन की है।

हिंदी संस्कृत अंग्रेजी यादि अनेक विषयों के अधिकारी विद्वान प्रख्यात शिक्षाविद डॉक्टर के के नारायण ने कहा की संस्कृत और सनातन संस्कृति एक प्राण दो देह की तरह है। इसे अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों नें हीं संपूर्ण विश्व जीवन के हर क्षेत्र सींचा है सवांरा है ज्योतित किया है।

प्रसिद्ध आयुर्वेदज्ञ आचार्य सच्चिदानंद मिश्र नईकी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयाम जैसे आयुर्वेद ज्योतिष गणित भौतिक धातु विज्ञान कृषि बागवानी मूर्ति कला चित्रकला वास्तु विज्ञान नृत्य संगीत दर्शन तथा पुराण आदि का विस्तृत एवं प्रमाणिक वर्णन किया गया है, जिसे हजारों वर्ष की पराधीनता के पश्चात भी विशेषत: विद्वान ब्राह्मणों ने जिस प्रकार से संस्कृत भाषा एवं बांग्मय को संरक्षित एवं संवर्धित किया वह विश्व में अप्रतिम उदाहरण है। किंतु दुर्भाग्यवश आजादी के बाद हमारे रहनुमाओं ने ही हमसे छीनने का प्रयास किया। फिर भी यह जीवंत है।

भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के राष्ट्रीय महासचिव ख्याति प्राप्त साहित्यकार प्रोफेसर मनोज कुमार मिश्र ने कहा कि यह निर्विवाद सत्य है कि वेद ही विज्ञान की जननी है। संपूर्ण भाषा का मूल संस्कृत ही है। संस्कृत भाषा को उचित स्थान दिलाने के लिए बुद्धिजीवियों को राष्ट्रवादियों को आगे आने की सलाह दी।

डॉ रविंद्र कुमार एवं डॉ दिनेश सिंह ने कहा संस्कृत भाषा के गौरवशाली इतिहास का अनुकरण और भविष्य के बारे में जागरूकता के लिए ही संस्कृत दिवस का आयोजन किया जाता है जिसे हमसब को मिलकर साकार रूप देना चाहिए।

विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने समारोह की अध्यक्षता करते हुए कहा की संस्कृत केवल एक भाषा नहीं बल्कि यह भारतीय संस्कृति और चेतना की वाहक है। इसे जीवंत बनाने ,की आवश्यकता है।

विष्णुपद मंदिर प्रबंधकारिणी समिति के सचिव प्रसिद्ध समाजसेवी गजाधर लाल पाठक जी ने कहा भारत की सांस्कृतिक आत्मा को पूर्ण जागृत करने के लिए वर्तमान केंद्रीय सरकार को साधुवाद देता हूं। चूंकि उनके विभिन्न अभियानों में एक अभियान यह भी है। और सचमुच यह संस्कृत ही मानवीय जीवन शैली का संदेश है।

अंत में धन्यवाद ज्ञापित करते हुए आचार्य सुनील पाठक ने कहा कि “सर्वे भवंतु सुखिनः” की शाश्वत चेतना को साकार करते हुए संस्कृत भाषा अपनी सर्व सुलभता उदारता एवं व्यापकता के कारण जागतिक कल्याण की भावना एवं सर्व मंगल की कामना से ओत-प्रोत होकर सृष्टि के आरंभ से ही हमारे पितृ ऋषि, ब्रह्मर्षि, मनीषियों ने अनुपम वैभव प्रस्तुत किया। जिसका विश्व इतिहास सदैव ऋणी रहेगा।

जिन प्रमुख व्यक्तियों समझ में भाग लेकर अपने विचार प्रकट कि उनमें प्रमुख रूप से आचार्य अरुण मिश्रा मधुप, पूर्व विधायक जी एस रामचंद्र दास, पंडित अजय मिश्रा, शंभू गिरी, हरिनारायण त्रिपाठी, ऋषिकेश गुर्दा, सत्येंद्र दुबे, इशरत जमील, हमीदा खातून, वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद याहिया, डॉक्टर ज्ञानेश भारद्वाज, डॉक्टर अरविंद कुमार, गजाधर लाल कटरियार, शंभू गुर्दा, अमरनाथ पांडे, रविकांत कुमार, बृजेश राय मनीष कुमार, मुरलीधर शर्मा, पुष्पा कुमारी, नीरज वर्मा, शशांक शेखर, सीमा कुमारी, रंजीत पाठक, पवन मिश्रा, विश्वजीत चक्रवर्ती, पार्वती देवी, रंजना पांडेय, राजेंद्र प्रसाद, संतोष कुमार, चांदनी सिंहा, इशिका सिंहा, मृदुला मिश्रा, उत्तम पाठक, सुनीता देवी, बृजेश मिश्रा, दीपक पाठक, मनीष कुमार अधिवक्ता, नीतू कुमारी, नदिया देवी, सलामुद्दीन खान, यादि उल्लेखनीय थे।

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